عرض القصيدة رقم : 298 - ألبست جارية ثوبا من الخفر
| | | ألبست جارية ثوبا من الخفر |
| 1 | | | ألبستُ | جاريةُ | ثوباً | من | الخفرِ |
| *** | | في | النومِ | ما | بينَ | بابِ | البيتِ | والحجرِ |
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| 2 | | | *** | | وغبتُ | فيهِ | عن | الإحساسِ | بالبشرِ |
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| 3 | | | واستصرختْ | في | نيات | الطوافِ | وفدْ |
| *** | | حسرنَ | عن | أوجهٍ | من | أحسنِ | الصُّورِ |
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| 4 | | | *** | | هذا | قتيلُ | الهوى | واللثمِ | والنظرِ |
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| 5 | | | قالتْ | لها | قبليهِ | الأمُّ | ثانيةً |
| *** | | عساه | يحيى | كمثلِ | النفخِ | في | الصور |
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| 6 | | | فالنفخُ | يخرجُ | أرواحَ | الورى | وبهِ |
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| 7 | | | *** | | |
| 8 | | | أُقبلُ | الأرض | إجلالاً | لوطأتها |
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| 9 | | | *** | | عند | التجلِّي | فقلتُ | النقصُ | من | بصري |
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| 10 | | | *** | | وأنتَ | منهنَّ | عينَ | الشمسِ | والقمرِ |
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| 11 | | | يا | حسنها | غادةً | كالشمسِ | طالعةً |
| *** | | تسبي | العقولَ | بذاكَ | الغنجِ | والحورِ |
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